बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर और कथावाचक पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री का एक बयान इन दिनों देशभर में चर्चा का विषय बना हुआ है। जयपुर में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने वेदों और भारतीय संस्कृति के अध्ययन को लेकर टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि समाज ने वेदों और सनातन परंपराओं से दूरी बनाई, तो आने वाली पीढ़ियों की सांस्कृतिक पहचान बदल जाएगी। इसी संदर्भ में उन्होंने कहा, “अगर वेद नहीं पढ़े तो बच्चे जावेद और नावेद बनेंगे।”
धीरेंद्र शास्त्री का यह बयान सामने आते ही सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में बहस शुरू हो गई। समर्थकों का कहना है कि उन्होंने यह बात भारतीय संस्कृति, परंपरा और वैदिक शिक्षा के संरक्षण के उद्देश्य से कही है। उनका मानना है कि आज की युवा पीढ़ी तेजी से अपनी जड़ों से दूर होती जा रही है और पश्चिमी या अन्य प्रभावों के कारण पारंपरिक ज्ञान को नजरअंदाज कर रही है।
वहीं आलोचकों ने इस बयान को संवेदनशील और विभाजनकारी करार दिया है। उनका कहना है कि किसी विशेष नाम या समुदाय का उदाहरण देना सामाजिक सौहार्द को नुकसान पहुंचा सकता है। कुछ सामाजिक संगठनों और नेताओं ने इस टिप्पणी पर आपत्ति जताते हुए धीरेंद्र शास्त्री से भाषा में संयम बरतने की अपील की है।
अपने बयान को लेकर धीरेंद्र शास्त्री के समर्थकों का कहना है कि इसे शाब्दिक अर्थ में नहीं, बल्कि संस्कृति और संस्कारों के प्रतीकात्मक संदर्भ में देखा जाना चाहिए। उनका दावा है कि शास्त्री का उद्देश्य किसी धर्म या समुदाय को निशाना बनाना नहीं, बल्कि वेदों, गुरुकुल परंपरा और सनातन शिक्षा के महत्व को रेखांकित करना है।
इसी कार्यक्रम में धीरेंद्र शास्त्री ने यह भी घोषणा की कि वे बागेश्वर धाम में एक गुरुकुल की स्थापना करने जा रहे हैं, जहाँ वेद, उपनिषद और भारतीय दर्शन की शिक्षा दी जाएगी। उनके अनुसार, यह पहल भारतीय ज्ञान परंपरा को पुनर्जीवित करने की दिशा में एक कदम होगी।
कुल मिलाकर, धीरेंद्र शास्त्री का यह बयान एक बार फिर धर्म, संस्कृति और अभिव्यक्ति की सीमाओं पर बहस को जन्म दे रहा है। समर्थक इसे सांस्कृतिक चेतावनी मान रहे हैं, जबकि आलोचक इसे असंवेदनशील बयान बता रहे हैं। आने वाले दिनों में यह मुद्दा और तूल पकड़ सकता है।

